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Friday, 29 April 2011

Aap ka naam

दिल की कीताब पर छपा
बस आप ही का नाम है,

दिन-रात हूँ जो पढ़ती
ये वो कलाम है....

बेखुदी जिस की न जाए...
ये वो विनय का जाम है,

आप ही के लिए हाज़िर
ये ज़िन्दगी तमाम है.

लिखते हुए आप का ये कलाम 
गुम हम अब सुबह शाम है, 

हम ले आए  है तूफ़ान से कश्ती,
साहील  तक पहुँचाना अब आप का काम है.




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