दिल की कीताब पर छपा
बस आप ही का नाम है,
दिन-रात हूँ जो पढ़ती
ये वो कलाम है....
बेखुदी जिस की न जाए...
ये वो विनय का जाम है,
आप ही के लिए हाज़िर
ये ज़िन्दगी तमाम है.
लिखते हुए आप का ये कलाम
गुम हम अब सुबह शाम है,
हम ले आए है तूफ़ान से कश्ती,
साहील तक पहुँचाना अब आप का काम है.
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